घर से तो निकला था लेकर सपने हजार,
बनाना था चाँद पर घर, करना था सबके दिलों पे राज।
जो भी किया दिल से किया,
जिंदगी का हर लम्हा मैंने खुल कर जिया।
शुरूआत छोटी थी पर इरादे बडे़ थे,
कामयाबी तो मिलनी ही थी, मेरे हौसले जो बुलंद थे।
कुछ लोगो का साथ मिला, कुछ लोगों ने कर लिया किनारा,
फिर भी चलता गया मैं, भले ही था गमो का मारा।
दुनिया वालो ने मेरे खिलाफ, कर ली बुलंद अपनी आवाज,
मचा था मेरे दिल मे भी शोर, मगर खामोश थी जबान।
कहता रहा अपने दिल से, कि तू चल तुझे कोई हरा नहीं सकता,
बस चलता जा तू, कि तुझे कोई मिटा नहीं सकता।
मगर नफरत के आगे मोहब्बत फिकी पड़ गई,
मेरी जिंदगी की कहानी बरबादी की तरफ मुड गई।
सम्भालना चाहता था खुद को उस आखिरी लम्हे तक,
चाहता था कि खड़ा हो जाऊँ फिर एक बार अपने पैरों पर।
मगर अंधेरा इतना घना था कि उम्मीद की कोई रोशनी नजर ही न आई,
चारो तरफ ढूंढा मगर, नसीब मे बस तनहाई ही आई।
चहरा तो सबने देखा मेरा, मगर कोई दिल नहीं देख पाया,
बाते तो सबने की मुझसे, मगर कोई मेरी खामोशी नहीं सुन पाया।
तन्हाईयों की गहराइयों में डूबता चला गया दिल मेरा, कि उसे कोई ढूंढ ही नहीं पाया।
पल -पल तड़प रहा था दिल,
रूह भी मर रही थी मेरी तिल -तिल।
दम घुट रहा था मेरा उस अंधेरे मे,
इसलिएँ जिंदगी को ही अलविदा कह दिया मैने चार दिवारो के पहरे मे।
कायर न समझना मुझे, बेबस हो गया था मैं,
इस दुनिया से लड़ते -लड़ते खुद ही हार गया था मैं।
जानता हूँ जो मैंने किया, वो सही नहीं,
मगर मेरे जैसे लोगों की इस दुनिया में कोई कदर नहीं।
जा रहा हूँ अब मैं ये दुनिया छोड़ कर,
रिश्ते नाते सब इस दुनिया से तोड़ कर।
मगर याद रखना, फिर लौटू़ंगा उस खुदा के घर से लेकर एक नया जीवन,
और तब न रोक पाएगा कोई मुझे लहराने से अपनी जीत का परचम।
- प्रेरणा राठी